“धार्मिक मामलों में जैसा प्रभाव इस पुरुष ने मेरे हृदय पर डाला, वैसा अब तक कोई अन्य व्यक्ति नहीं डाल सका है।”

~ महात्मा गांधी ~

(मॉडर्न रिव्यू, जून 1930)

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श्रीमद्जी और गांधीजी

एक अनूठा संबंध

महात्मा गांधी के आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में सम्मानित, श्रीमद् राजचंद्रजी का राष्ट्रपिता पर अत्यंत गहरा और रचनात्मक प्रभाव था। श्रीमद्जी ने गांधीजी के विचारों को आकार दिया और उनकी मान्यताओं का मार्गदर्शन किया। उन्होंने 'महात्मा' के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके आधार पर गांधीजी ने भारत को स्वतंत्रता दिलाई और पीढ़ियों को प्रेरित किया। उनकी यह विरासत वैश्विक शांति और मानव प्रगति के लिए आज भी नए प्रतिमान प्रस्तुत कर रही है।

श्रीमद्जी और गांधीजी

भारतीय इतिहास की एक अनकही गाथा

“मैंने उनके दैनिक जीवन को आदरपूर्वक और बहुत निकट से देखा। उस समय वे जो कुछ भी कर रहे होते—चाहे भोजन कर रहे हों, विश्राम कर रहे हों या बिस्तर पर लेटे हों—सांसारिक वस्तुओं के प्रति वे सदा अनासक्त रहते थे। मैंने उन्हें इस संसार के भोग-विलास की वस्तुओं से कभी आकर्षित होते नहीं देखा। कविश्री को देखकर मुझे यह अनुभूति हुई कि अनासक्ति की यह दशा उनका सहज स्वभाव थी।”
~ महात्मा गांधी ~
सत्य के प्रयोग – अध्याय 'रायचंदभाई'

उनकी पहली भेंट 1891 में मुंबई में हुई थी, जब गांधीजी एक युवा बैरिस्टर के रूप में इंग्लैंड से लौटे थे। श्रीमद्जी के आंतरिक समभाव, आध्यात्मिक साधना में लीनता, शास्त्रों के ज्ञान और नैतिक निष्ठा ने गांधीजी पर एक गहरी छाप छोड़ी। मुंबई में बिताए उन दो वर्षों के दौरान गहन सत्संग व संवाद से उनका संबंध और प्रगाढ़ हुआ।

श्रीमद् राजचंद्रजी पर पूज्य गुरुदेवश्री

आध्यात्मिक संकट में आश्रय

“मेरे आध्यात्मिक संकट के क्षणों में, श्रीमद्जी ही मेरा आश्रय थे।”
~ महात्मा गांधी ~
सत्य के प्रयोग – अध्याय 'रायचंदभाई'

दक्षिण अफ्रीका जाने के बाद, गांधीजी ने पत्रों के माध्यम से श्रीमद्जी से संवाद जारी रखा। वे श्रीमद्जी के गहन दार्शनिक विचारों से अत्यंत प्रभावित हुए। एक बार, जब गांधीजी अपनी पहचान और धर्म को लेकर एक कठिन संकट से जूझ रहे थे, तब उन्होंने 27 प्रश्न लिखकर श्रीमद्जी से मार्गदर्शन मांगा। श्रीमद्जी के उत्तरों ने उनकी सभी शंकाओं का समाधान किया और गांधीजी को अपने धर्म की गहराई में उतरने के लिए प्रेरित किया।

श्रीमद्जी और गांधीजी

गहरा प्रभाव

“मैंने अक्सर यह कहा है कि मैंने अनेक व्यक्तियों के जीवन से बहुत कुछ सीखा है। परंतु कविश्री (श्रीमद्जी) के जीवन से मैंने सबसे अधिक सीखा है। उनके जीवन से ही मैंने करुणा के मार्ग को समझा।”
~ महात्मा गांधी ~
(अहमदाबाद में भाषण, नवंबर 1921)

उनके घनिष्ठ संबंध ने गांधीजी के नैतिक चरित्र को गढ़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सत्य, करुणा और अहिंसा के सिद्धांतों के प्रति श्रीमद्जी की सहज निष्ठा ही आगे चलकर गांधीवाद के मूलभूत सिद्धांतों के रूप में स्थापित हुई।

श्रीमद् राजचंद्रजी पर पूज्य गुरुदेवश्री

हृदयस्पर्शी श्रद्धांजलि

“हम सब संसारी लोग हैं जबकि श्रीमद् इस संसार के नहीं थे। हमें अनेक जन्म लेने होंगे, जबकि श्रीमद् के लिए कदाचित एक जन्म ही पर्याप्त है। हम शायद मोक्ष से दूर भाग रहे होंगे, जबकि श्रीमद् अत्यंत तीव्र गति से मोक्ष की ओर अग्रसर थे।”
~ महात्मा गांधी ~
(रायचंदभाई के कुछ संस्मरण)

1901 में 34 वर्ष की अल्पायु में श्रीमद्जी द्वारा देहत्याग के उपरांत भी, गांधीजी बार-बार उनके पत्रों और रचनाओं पर चिंतन-मनन करते रहे। गांधीजी श्रीमद्जी के बारे में लिखते थे, भाषणों में उनका उल्लेख करते थे और अपने निकट सहयोगियों के साथ उन पर चर्चा करते थे। वे श्रीमद्जी के साथ अपने संबंध और उनकी आध्यात्मिक कृतियों से निरंतर गहराई से प्रेरित होते रहे।

श्रीमद्जी और गांधीजी

राष्ट्र के प्रति योगदान

“मैं उनके (श्रीमद् राजचंद्र के) जीवन और उनके साहित्य पर जितना अधिक विचार करता हूँ, उतना ही मुझे यह विश्वास होता है कि वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ भारतीय थे।”
~ महात्मा गांधी ~
(एच. एस. एल. पोलाक को पत्र – 26 अप्रैल 1909)

एक निष्कपट मित्रता से आरंभ हुआ यह संबंध आगे चलकर उस मुकाम पर पहुँचा जहाँ गांधीजी ने श्रीमद्जी को अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक घोषित किया। अहिंसा के वैश्विक दूत के रूप में प्रतिष्ठित गांधीजी, श्रीमद्जी की शिक्षाओं के सदैव ऋणी रहे। उनके पावन संबंध ने भारत और संपूर्ण विश्व के सांस्कृतिक, राजनीतिक व आध्यात्मिक इतिहास में एक गौरवमयी नए अध्याय का सूत्रपात किया।

युगपुरुष – महात्मा ना महात्मा नाटक मंचन की एक झलक

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युगपुरुष – नाटक

'युगपुरुष – महात्मा ना महात्मा' श्रीमद्जी और गांधीजी को समर्पित एक श्रद्धांजलि है, जो उनके विशेष संबंध को दर्शाती है। श्रीमद् राजचंद्र मिशन धरमपुर द्वारा निर्मित, यह पुरस्कार-विजेता नाट्य प्रस्तुति सत्य और अहिंसा के मूल्यों का एक सशक्त अनुभव कराती है। एक प्रेरक आध्यात्मिक विरासत को पुनर्जीवित करते हुए, यह नाटक आपके चरित्र और चेतना को रूपांतरित करता है।

16वां वार्षिक Transmedia Gujarati Screen & Stage Awards 2016

सर्वश्रेष्ठ नाटक

सर्वश्रेष्ठ निर्देशक

राजेश जोशी

सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता

पुलकित सोलंकी

Transmedia Awards

Dadasaheb Phalke Excellence Awards 2017

सर्वश्रेष्ठ नाटक

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27 प्रश्न

27 प्रश्न

दक्षिण अफ्रीका में एक आध्यात्मिक दुविधा के दौरान, गांधीजी ने श्रीमद्जी को एक पत्र लिखा जिसमें आत्मा के अस्तित्व, परलोक और मोक्ष से संबंधित 27 प्रश्न शामिल थे। श्रीमद्जी ने हीरे जैसी स्पष्टता के साथ इन प्रश्नों के उत्तर दिए और गांधीजी की व्याकुलताओं का समाधान किया। इन 27 प्रश्नों और उत्तरों को जानें!

यह पुस्तक मिशन के केंद्रों से प्राप्त की जा सकती है।

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