श्रीमद् राजचंद्रजी का परिचय
पत्रांक 123
भगवान महावीर और श्रीमद् राजचंद्रजी
2500 से अधिक वर्ष पूर्व, 24वें जैन तीर्थंकर भगवान महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया। तब से, अनेक आत्मज्ञानी संतों ने उनकी इस विरासत को आगे बढ़ाया है। 150 से अधिक वर्ष पूर्व, आत्मज्ञानी संत श्रीमद् राजचंद्रजी ने महान आध्यात्मिक ऊँचाइयों को छुआ और आत्म-खोज के मार्ग को सहज व सुगम बनाया।
पत्रांक 123
महान आध्यात्मिक विभूति

श्रीमद् राजचंद्रजी एक ऐसे युगद्रष्टा थे, जिन्होंने एक नए युग के लिए अध्यात्म की नींव रखी। एक ऐसे आत्मज्ञानी महापुरुष, जो आत्म-चेतना की सर्वोच्च अवस्था में लीन रहे। एक ऐसे प्रज्ञावान संत, जिन्होंने अपनी सशक्त लेखनी से मोक्षमार्ग को अंकित किया। वे 19वीं सदी के उत्तरार्ध के एक आत्मज्ञानी संत, जैन धर्म के सुधारक और एक अद्वितीय कवि-दार्शनिक थे।
‘युगपुरुष’ के रूप में सम्मानित, उन्होंने मात्र 34 वर्ष के अल्प जीवनकाल में विश्व को एक ऐसी समृद्ध विरासत दी, जो आज भी साधकों की पीढ़ियों का मार्गदर्शन कर रही है। उनका जीवन और रचनाएँ भीतर मुड़ने और शाश्वत सत्यों की खोज करने का निमंत्रण हैं।
श्रीमद्जी की शिक्षाओं का सार
पहाड़ की तलहटी में खड़े होकर केवल आसपास का परिवेश ही दिखाई देता है। शिखर पर पहुँचने पर समस्त अस्तित्व दृष्टिगोचर हो जाता है। श्रीमद् राजचंद्रजी उसी सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित थे। उनका प्रत्येक शब्द आंतरिक अनुभूति से, प्रत्येक अभिव्यक्ति सार्वभौमिक दृष्टि से और प्रत्येक संदेश असीम करुणा से प्रकट हुआ था।

सद्गुरु वे हैं जिन्होंने आत्मा का अनुभव किया है और जो आत्म-स्वरूप में ही रमण करते हैं। जिन्होंने स्वयं मार्ग प्राप्त किया है, केवल वे ही आपको इसे प्राप्त करने में सहायता कर सकते हैं। मन, वचन और काया से उनके प्रति समर्पित होना ही अज्ञान के पूर्ण नाश का उपाय और मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग है। सच्चे साधकों को किसी जीवंत आत्मज्ञानी गुरु से जुड़ना चाहिए और पूर्ण निष्ठा के साथ उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए।

सद्गुरु वे हैं जिन्होंने आत्मा का अनुभव किया है और जो आत्म-स्वरूप में ही रमण करते हैं। जिन्होंने स्वयं मार्ग प्राप्त किया है, केवल वे ही आपको इसे प्राप्त करने में सहायता कर सकते हैं। मन, वचन और काया से उनके प्रति समर्पित होना ही अज्ञान के पूर्ण नाश का उपाय और मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग है। सच्चे साधकों को किसी जीवंत आत्मज्ञानी गुरु से जुड़ना चाहिए और पूर्ण निष्ठा के साथ उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए।

साहित्यिक रचनाएं
सरल, सटीक और फिर भी अत्यंत गूढ़ – श्रीमद्जी की साहित्यिक रचनाएं उनकी सर्वोच्च आंतरिक अवस्था की अभिव्यक्ति हैं। आध्यात्मिक जीवन का एक स्पष्ट और पूर्ण मार्ग प्रशस्त करते हुए, इनका एक बार का पठन ही अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों के समाधान के लिए पर्याप्त है, जबकि प्रत्येक अगला पठन आपको और गहराई में ले जाता है, जब तक कि न तो प्रश्नकर्ता बचता है और न ही प्रश्न। उनके दार्शनिक साहित्य के विशाल भंडार में सिरमौर है श्री आत्मसिद्धि शास्त्र, जो 142 गाथाओं की एक पद्यमय कालजयी कृति है।

साहित्यिक रचनाएं
सरल, सटीक और फिर भी अत्यंत गूढ़ – श्रीमद्जी की साहित्यिक रचनाएं उनकी सर्वोच्च आंतरिक अवस्था की अभिव्यक्ति हैं। आध्यात्मिक जीवन का एक स्पष्ट और पूर्ण मार्ग प्रशस्त करते हुए, इनका एक बार का पठन ही अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों के समाधान के लिए पर्याप्त है, जबकि प्रत्येक अगला पठन आपको और गहराई में ले जाता है, जब तक कि न तो प्रश्नकर्ता बचता है और न ही प्रश्न। उनके दार्शनिक साहित्य के विशाल भंडार में सिरमौर है श्री आत्मसिद्धि शास्त्र, जो 142 गाथाओं की एक पद्यमय कालजयी कृति है।


श्रीमद्जी और गांधीजी
महात्मा गांधी के आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में सम्मानित, श्रीमद् राजचंद्रजी का राष्ट्रपिता पर अत्यंत गहरा और निर्माणकारी प्रभाव था।
‘युगपुरुष – महात्मा ना महात्मा’ श्रीमद् राजचंद्रजी और महात्मा गांधी के मध्य के विशेष संबंध की एक मनोहारी नाट्य प्रस्तुति है। सात भाषाओं में 1000 से अधिक मंचनों के साथ, इस नाटक की एक वर्ष की यात्रा ने कई पुरस्कार और सराहनाएं प्राप्त कीं, और विश्वभर के लाखों लोगों के दिलों को छुआ।

श्रीमद् राजचंद्रजी के विषय में पूज्य गुरुदेवश्री
श्रीमद्जी का सम्मान
श्रीमद्जी का आध्यात्मिक प्रकाश संपूर्ण विश्व में फैल रहा है। श्रीमद् राजचंद्र मिशन धरमपुर के माध्यम से उन्हें अनेक रूपों में सम्मानित किया गया है।
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