मुंबई, फागन सुद 11, रविवार 1950
तीर्थंकरदेव आलस्य को कर्म कहते हैं और आलस्य के अभाव को उससे भिन्न, अर्थात् कर्म रहित आत्मा कहते हैं। इन विशिष्ट विशेषताओं के माध्यम से अज्ञानी और प्रबुद्ध व्यक्ति के स्वरूप का वर्णन किया गया है।
(सुयगादंगसूत्र वीर्य अध्ययन)
जिस परिवार में जन्म होता है और जिसके साये में रहता है, उस परिवार से अज्ञानी व्यक्ति का लगाव हो जाता है और वह उसी में लीन रहता है।
(सुयागदांग-प्रथमध्यायन)
अतीत में जो प्रबुद्ध हुए और भविष्य में जो प्रबुद्ध होंगे, उन सभी ने 'शांति' (अर्थात सभी अशुद्ध विकारों से विरक्ति करना, उनसे दूर रहना) को सभी धर्मों का आधार बताया है। जिस प्रकार पृथ्वी प्रत्येक प्राणी का आधार है, अर्थात् प्रत्येक जीव पृथ्वी के सहारे ही अस्तित्व में है, उसके लिए पृथ्वी का सहारा होना आवश्यक है, उसी प्रकार पृथ्वी की तरह सभी प्रकार के कल्याण का आधार 'शांति' है, ऐसा प्रबुद्ध ने कहा है। (सुयागदांग)









